संपादकी: नई तकनीकों पर केंद्रित है रबी फसल


हेमन्त धोटे

रबी सीजन की शुरुआत उत्साहजनक है, लेकिन किसानों को मौसम के उतार-चढ़ाव और कीटों के प्रकोप से बचने के लिए आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक सलाह का पालन करना होगा। तभी वे खरीफ  की कमी को पूरा कर अच्छा मुनाफा कमा पाएंगे और देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी। रबी फसल पर मुख्य रूप से बुवाई के आंकड़ों, मौसम के प्रभाव और नई तकनीकों पर केंद्रित होते हैं, जिसमें इस वर्ष बुवाई में तेजी, खासकर गेहूं, चना और सरसों में, और खरीफ की फसल के नुकसान के बाद किसानों की रबी से उम्मीदें प्रमुखता से छाई हुई हैं, जहाँ हैप्पी सीडर जैसी मशीनें और स्मार्ट कृषि विधियाँ उत्पादन बढ़ाने और मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद कर रही हैं, लेकिन अनियमित बारिश और कीटों से बचाव के लिए उचित प्रबंधन आवश्यक है।  लंबे मानसून और मिट्टी में नमी के कारण रबी फसलों (गेहूं, चना, सरसों, जौ, मटर) की बुवाई तेजी से हुई है, कई क्षेत्रों में पिछले साल के आंकड़ों को पार कर गई है। गेहूं का रकबा तेजी से बढ़ा है, जो अच्छी पैदावार की उम्मीद जगाता है। खरीफ फसलें (जैसे धान) बारिश से प्रभावित हुई थीं, इसलिए रबी की फसल से किसानों को काफी उम्मीदें हैं। ठंडी जलवायु रबी फसलों के लिए अनुकूल है, लेकिन अनियमित बारिश या अत्यधिक गर्मी उत्पादन को प्रभावित कर सकती है, जिससे सिंचाई और जल प्रबंधन महत्वपूर्ण हो जाता है। जीपीएस, रोबोटिक्स जैसी तकनीकों से खेती में सटीकता और दक्षता आ रही है। हैप्पी सीडर जैसी मशीनें पराली प्रबंधन और सीधी बुवाई में मदद कर रही हैं, जिससे जुताई की जरूरत कम होती है और मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरता है। सरकार द्वारा उन्नत बीज और खाद प्रबंधन के तरीके किसानों तक पहुंचाए जा रहे हैं। बुवाई से पहले बीज जैसे चना, गेहूं का शोधन करना, रोगों से बचाव में सहायक होता है। मिट्टी की जांच कराकर ही खाद का प्रयोग करें, जिससे उर्वरता बनी रहे और उत्पादन बढ़े। रबी की सब्जियों और फसलों में कीटों व बीमारियों (जैसे फफूंद) के लिए उचित कीटनाशकों का छिड़काव करें।  सामान्य समय से लगाई गई गेहूं की फसल में इस समय कीट, रोग और खरपतवार का प्रकोप हो सकता है। गेंहू की फसल को सामान्यत: तीन खतरों से बचाना है। जब नम पूर्वा हवा चलती है, फसल में रोग व कीट प्रकोप ज्यादा रहता है। पूर्वा हवा में फसल में नमी बनी रहती है और नमी की वजह से कई तरह के कीट और रोग के पनपने की आदर्श परिस्थियां बन जाती हैं। इस समय सरसों में कीट व माहू कीट का प्रकोप होने का डर ज्यादा रहता है।  इस में शुरू में फसलों के छोटे पौधों पर आरामक्खी की गिडारें (काली गिडार व बालदार गिडार) नुकसान पंहुचाती हैं। गिडारें काले रंग की होती हैं।  जो पत्तियों को बहुत तेजी के साथ किनारों से विभिन्न प्रकार के छेद बनाती हुई खाती हैं, जिस के कारण पत्तियों बिल्कुल छलनी हो जाती हैं।   इन फसलों को लौटते मानसून और पूर्वोत्तर मानसून के मौसम के दौरान(अक्तूबर) बोया जाता है, जिन्हें रबी या सर्दियों की फसल कहा जाता है। इन फसलों की कटाई सामान्यत: गर्मी के मौसम में अप्रैल और मई के दौरान होती है। इन फसलों पर वर्षा का अधिक प्रभाव नहीं पड़ता है। रबी की प्रमुख फसलें गेहूँ, चना, मटर, जौ आदि हैं। बीजों के अंकुरण के लिये गर्म जलवायु और फसलों के विकास हेतु  ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है।   चने की फसल में इल्लियों का प्रकोप बहुतायत से पाया जाता है। नियंत्रण के लिये समन्वित मिले- जुले उपाय अपनायें, फसल के बीच टी आकार की खूंटियां गाड़ें । इन खूंटियों पर कोलवार नाम का पक्षी आकर बैठते हैे।  जो कीट भक्षी है और इल्लियां इनका प्रिय भोजन होती है। इल्लियों के नियंत्रण का यह देशी और प्राकृतिक इलाज हैे। इसे शुरू से ही अपनायें। चने के खेत के पास अफ्रीकी गेंदा व धनिया लगाकर रखें इससे चने की इल्ली के अंडों व इल्ली के परजीवियों की संख्या बढ़ाने में सहायता मिलेगी जो प्राकृतिक रूप में इनको नियंत्रित करने में सहायक होती है। रसायनिक नियंत्रण में लेम्डा- साइहेलोथ्रिन 5 प्रतिशत ई.सी.या ट्राईजोफॉस 40 प्रतिशत ई.सी. 30 मि.ली. प्रति स्प्रेयर (15 लीटर पानी) में घोल बनाकर छिड़काव करें।  मिथाइल पैराथियान या क्विनालफॉस डस्ट भी चने की इल्लियों के नियंत्रण में कारगर है। 10 किलो डस्ट प्रति एकड़, डस्टर मशीन से प्रात: या शाम को भुरकाव करें।

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