-बारहमासी मूंगफली की फसल उगाते समय यह बेहतर तकनीक अपनाएं
नई दिल्ली। मूंगफली ज़रूरी तिलहन फसलों में से एक है। मूंगफली की खेती खरीफ, रबी और गर्मियों में बारहमासी फसल के तौर पर की जा सकती है।
ज़मीन और खेती
- -इसके लिए, मीडियम से भारी और अच्छी पानी निकलने वाली ज़मीन चुननी चाहिए।
- -ज़मीन की गहरी जुताई और हैरो चलाना चाहिए।
- -आखिरी हैरोइंग से पहले, मिट्टी में 5 टन अच्छी तरह से सड़ी हुई गाय का गोबर या कम्पोस्ट मिलाना चाहिए।
किस्मों का चुनाव
- -मूंगफली की खेती करते समय बेहतर किस्मों का इस्तेमाल करना चाहिए।
- -डॉ. बालासाहेब सावंत कोंकण एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी ने 'कोंकण गौरवÓ, 'कोंकण ट्रॉम्बे टपोराÓ, 'कोंकण भूरत्ना' किस्में डेवलप और प्रोड्यूस की हैं।
- -ये किस्में कोंकण में खरीफ, रबी और गर्मी के मौसम में खेती के लिए सही हैं।
बीज और बीज ट्रीटमेंट
- -खेती के लिए अच्छे और क्वालिटी वाले बीज चुनने चाहिए। प्रति हेक्टेयर 100 से 125 द्मद्द बीज इस्तेमाल करने चाहिए।
- -स्टेम रॉट को फैलने से रोकने के लिए, बीजों को 3 ग्राम प्रति द्मद्द की दर से थीरम से ट्रीट करना चाहिए। इसके अलावा, बीज ट्रीटमेंट के लिए 20 ग्राम राइज़ोबियम और 50 ग्राम फ़ॉस्फ़ोरस का इस्तेमाल करना चाहिए।
बोने का तरीका
- -बोने से पहले ज़मीन को समतल कर लेना चाहिए। ज़रूरत हो तो एक शिफ्ट पानी दें।
- - बोना टोकन तरीके से करना चाहिए।
- -अपलैंड वैरायटी की बोना दो लाइनों में 30 सेंटीमीटर की दूरी पर करना चाहिए।
- -सेमी-स्प्रेड और स्प्रेड वैरायटी के लिए, दो लाइनों के बीच की दूरी 10 से 15 सेंटीमीटर रखनी चाहिए।
प्लास्टिक मल्च का इस्तेमाल
- -कोंकण में मूंगफली से ज़्यादा प्रोडक्शन और प्रॉफि़ट पाने के लिए, फ़सल को चौड़ी लाइनों और लाइनों में 80 सेंटीमीटर गुणा 20 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाना चाहिए और सात माइक्रोन मोटी ट्रांसपेरेंट प्लास्टिक मल्च से ढक देना चाहिए।
- -प्लास्टिक मल्च वीड कंट्रोल के लिए फ़ायदेमंद है।
वॉटर मैनेजमेंट
- -प्लास्टिक मल्च के इस्तेमाल से फसल की पानी की ज़रूरत कम हो जाती है। इसलिए, 1 से 2 शिफ्ट में पानी कम लगता है।
- - फसल के बढऩे के समय, दो शिफ्ट के बीच का अंतर 15 से 20 दिन रखना चाहिए।
- -लेकिन, जब फसल में फूल आ रहे हों और फली भर रही हो, तो दो सिंचाई के बीच का अंतर 12 से 15 दिन होना चाहिए।
- -इसलिए, फसल के लिए 9 सिंचाई काफी हैं।
- -मूंगफली के लिए प्लास्टिक मल्चिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने पर प्रति हेक्टेयर 45 से 50 क्विंटल पैदावार मिलती है।
